औरत ही औरत से जलती है

औरत ही औरत से जलती है ,
 अपने भावनाओं का कत्ल,
  खुद अपने हाथों से कर ती है ,
  औरत ही औरत से जलती है .
  जैसे ही माँ ,माँ से सास ,
  बहन,  बहन से नंनद  ,
  और बेटी ,बेटी से बहु बनती है ,
   नारी की परिभाषा,
  खुद बी खुद बदलती है ,
  औरत ही औरत से जलती है .
  सौदा करती है  खुद ही खुद से ,
   एक एक पैसे को झगडती है ,
 औरत ही औरत से जलती है ,
  कभी जलाती सास बहु को ,
  तो कभी बहु सास को निकालती,
  है घर से ,
  कभी ननद भाभी पर भरी ,
 कभी भाभी से हारी,
 लगा के आग अपने हाथो,
 अपनी खुसी में ,
 खुद ही सिसकती   है
 औरत ही औरत से जलती है .
 



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