एक हिंदुस्तान ऐसा भी है
देख कर अमीरों की बड़ी -बड़ी इमारतें कोई जलता है ,
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है ,
जो फुटपाथों पर पलता है .
पी जाता है कोई करोड़ों के दारू ,
और कोई दूध की एक एक बूंद को तरसता है ,
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है जो फुटपाथों पलता है .
नोटों के सिगरेटों से कोई ,
अपना मन बहलाता है ,
और कोई अपने बुझे चूल्हों के राखों
को देख कर अपने अरमानों को मसलता है
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है ,
जो फुटपाथों पर पलता है .
नाज कर ते है हम,
चंद अमीरों के बच्चों पर ,
पर उन आंसुओं का क्या जो ,
ढाबों और कूड़े की ढेरों पर ,
सूखता और छलकता है ,
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है ,
जो फुटपाथों पर पर पलता है ,
दाह संस्कार करता है कोई ,
घी और चन्दन की लकड़ियों से ,
और कोई बिना कफ़न के ही
लावारिश की तरह सड़ता है ,
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है ,
जो फुटपाथों पर पलता है ,
कहते फिर रहे कि हम चाँद पर ,
और बसाने वाले हिन् एक नई बस्ती ,
और कहीं गरीब का घर जलता है ,
एक हिंदुस्तान ऐसा भी है ,
जो फुटपाथों पर पलता है .
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